| सूक्ष्म भुगतान पर यू.आई.डी.ए.आई. का दृष्टिकोण: |
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पिछले 20 वर्षों में भारत की अपनी आर्थिक एवं विनियामक संरचना में एक परिवर्तन आया है। इस अवधि में नीतिगत सुधारों ने हमारे बाज़ार की बढ़ती परिपक्वता के साथ ही स्वस्थ विनियमन का भी नेतृत्व किया है। इनमें डी -लाइसेंसिंग, उद्यमशीलता, प्रौद्योगिकी का उपयोग, राज्य के शासन एवं स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रीकरण, आदि विशेष रूप से प्रमुख हैं। जिन्होंने भारत को एक प्रतिबंधात्मक एवं सीमित समाज से उठाकर एक अधिक सशक्त खुली पहुंच वाली अर्थव्यवस्था तक पहुंचाया है। जहां जनसाधारण संसाधनों और सेवाओं का और अधिक आसानी और प्रभावशाली ढंग से उपयोग कर सकते हैं।
लेकिन इन प्रयासों के बावजूद वित्त पोषण का उपयोग ग्रामीण भारत में एवं देश के अतिनिर्धन वर्ग में दुर्लभ है। आज, ग्रामीण भारत में बैंक खातों का उपयोग 40 प्रतिशत तक ही सीमित है और यह भारत के पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी हिस्सों में तीन/पांच से भी अधिक है, यह अंतर समाज को कमज़ोर करता है। आखिरकार आर्थिक अवसर वित्तिय उपयोग के साथ गुंथे हुए होते हैं। इस तरह के वित्तिय उपयोग विशेष रूप से निर्धनों के लिये मूल्यवान होते हैं और उन लोगों के लिये राहत का काम करते हैं जिनकी आय कम एवं परिवर्तनशील होती है। यह उन लोगों को बचत करने एवं अचानक आयी आर्थिक तंगी से बचने एवं निवेश करने का अवसर प्रदान करती है। इस तरह की बचत एवं बीमा निर्धनों को संभावित घटनाओं- बीमारी, रोजगार की हानि, सूखा एवं फसलों को हुए नुकसान आदि से बचाते हैं। हालांकि, वित्तिय सेवाओं के उपयोग की कमी के कारण बहुत से निर्धन भारतीयों को बचत करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। भारत में वित्तिय उपयोग की कमी को दूर करने के लिये नियामक ने वित्तिय सेवाओं तक पहुंच को बेहतर बनाने पर नये एवं अभिनव ढंग से जैसे शून्य शेष के खातों को खोलकर बैंकिंग एवं एटीएम नीतियों के सरलीकरण, व्यापार-प्रतिनिधि के माध्यम से बिना शाखा की बैंकिंग पर ध्यान केन्द्रित किया है जो कि स्थानीय बिचैलियों जैसे कि स्व-सहायता समूह एवं किराना दुकान को बैंकिंग सेवाऐं उपलब्ध कराने में सक्षम होंगे। इन्हीं से संबंधित और प्रयास जैसे कोर बैंकिंग समाधान आदि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में किये गये हैं और इसी तरह भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के मेल से देश में भुगतान और निपटान के लिये एक राष्ट्रीय अधोसंरचना उपलब्ध करायी जायेगी। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति जैसे कोर बैंकिंग, एटीएम, एवं मोबाइल कनेक्टिविटी आदि ने भी बैंकिंग पर भारी प्रभाव बनाया है; विशेषकर मोबाइल फोन के रूप में देश में वित्तिय सेवाओं को फैलाने में एक बहुत बड़ा अवसर मौजूद है। इन प्रौद्योगिकियों के कारण बैंकों को वास्तविक रूप से अपने ग्राहकों के लिये पास रहने की अनिवार्यता को कम कर दिया है एवं इसके फलस्वरूप बैंक इंटरनेट एवं मोबाइल बैकिंग के द्वारा सेवा प्रदान करने के प्रयोग में सक्षम हुए हैं। एटीएम के अलावा इन विकल्पों ने देश भर में कई शहरी गैर-निर्धन निवासियों को सस्ती और सुलभ बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराई है। पहचान एवं उपयोग की चुनौती के अतिरिक्त एक तीसरी सीमा उन निर्धनों की है, जो छोटी राशियों, सामान्यतः सूक्ष्म भुगतान के रूप में संदर्भित होते हैं में लेन-देन करते हैं को बैंकिंग सेवाऐं प्रदान करने की लागत हैं चूंकि इस तरह के लेन-देन की लागत बहुत अधिक होती है, अतः बैंक इस तरह के भुगतानों को नीरस मानता है। विशिष्ट पहचान संख्या (आधार) जो कि व्यक्तियों को उनके जनसांख्यिकी एवं बायोमेट्रिक्स की जानकारी के आधार पर अलग-अलग पहचानता है, व्यक्ति को देश भर में सार्वजनिक एवं निजी एजेंसियों को स्पष्ट पहचान स्थापित करने में सहायता करता है। यह वित्तिय समावेशों की मौजूदा सीमा को दूर करने में एक अवसर भी प्रदान करता है। आधार संख्या, निर्धनों को बैंक में अपनी पहचान स्थापित करने में मदद करता है। परिणामस्वरूप बैंक को अपने शाखा रहित बैंकिंग की तैनाती को बढ़ाने एवं कम लागत पर व्यापक जनसंख्या तक पहुंचने में सहायता मिलती है। वित्तिय समावेश को बढ़ावा देने के लिये एक कुशल, किफायती भुगतान समाधान की सख्त आवश्यकता है। आधार के साथ प्रमाणीकरण तंत्र को मौलिक प्रौद्योगिक अनुप्रयोग से जोड़कर वांछित सूक्ष्म भुगतान का समाधान प्राप्त किया जा सकता है। यह कम लागत पर वित्तिय सेवाओं को प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर के पास प्राप्त करने की सुविधा देता है। आधार-समर्थ, सूक्ष्म भुगतान की प्रमुख विशेषताऐं निम्न प्रकार हैं: यू.आई.डी.ए.आई. , अपना घर जाने (के.वाई.आर.)अपना ग्राहक जाने (के.वाई.सी.) के लिये पर्याप्त है। भारत में बैंक को ग्राहकों के नये खाता खोलते समय धोखाधड़ी को कम करने हेतु ग्राहक पहचान प्रक्रिया का अनुसरण करने की आवश्यकता होती है। यू.आई.डी.ए.आई. के सख्त प्रमाणीकरण को अपना घर जाने (के.वाई.आर.) के मानक के साथ जोड़कर, अपना ग्राहक जाने (के.वाई.सी.) की आवश्यकता को बैंकों द्वारा शून्य शेष पर खाते खोलते समय हटाया जा सकेगा। इस प्रकार बड़े पैमाने पर बैंकों में खाता खोलने के लिए आवश्यक दस्तावेजों को कम किया जा सकेगा एवं केवाईसी के खर्च में भी कमी आयेगी।
सर्वव्यापक बीसी नेटवर्क एवं बीसी विकल्पः- यू.आई.डी.ए.आई. की स्पष्ट प्रमाणीकरण एवं सत्यापन प्रक्रिया बैंकों को ग्राम आधारित बीसी जैसे स्व-सहायता समूह एवं किराना दुकान के साथ नेटवर्क बनाने की अनुमति देता है। ग्राहक स्थानीय बीसी के पास पैसा जमाकर अथवा निकाल सकते हैं। स्थानीय स्तर पर एकाधिक बीसी होने से ग्राहकों के पास विकल्प बना रहता है। यह, विशेषकर गांव के ग्राहकों की स्थानीय सत्ता संरचना पर निर्भरता कम करेगा एवं बीसी द्वारा शोषण किये जाने की आशंका भी कम होगी।
उच्च मात्रा कम लागत के राजस्व पर पहुंचः- यू.आई.डी.ए.आई. , ग्राहक अधिकरण उच्च लागत, उच्च लेन देन लागत एवं निश्चित आईटी लागत जो कि निर्धनों के खाता खोलने पर होती है, को कम करेगा।
इलेक्ट्रॅानिक लेन-देनः- यू.आई.डी.ए.आई. की प्रमाणीकरण प्रक्रिया बैंकों को व्यक्तिगत या दूरस्थ निर्धनों को सत्यापित करने की अनुमति देता है। ग्रामीण एक दूसरे से अथवा व्यक्तिगत एवं गांव के बाहर किसी फर्म से इलेक्ट्रॅानिक लेनदेन कर सकेंगे। इस तरह उनकी नगद पर निर्भरता एवं लेनदेन की लागत कम होगी। एक बार यह व्यापक प्रयोजनीय आधार समर्थित सूक्ष्म भुगतान प्रणाली शुरू हो जाती है तो अन्य किस्म के वित्तिय साधनों जैसे- सूक्ष्म ऋण, सूक्ष्म बीमा, सूक्ष्म पेंशन एवं सूक्ष्म म्युचुअल निधि को इस भुगतान प्रणाली पर प्राथमिकता से लागू किया जा सकेगा।
आधार समर्थित सूक्ष्म भुगतान समाधान, आधार के कई उन्नतिशील अनुप्रयोगों में से एक है।
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| पंजीयकों के रूप में वित्तिय संस्थाओं की सूचीः- |
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बैंक ऑफ इंडिया
बैंक ऑफ बड़ौदा
सेंट्रल बैंक
युनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया
कारपोरेशन बैंक
इंडियन बैंक
पंजाब एण्ड सिंध बैंक
पंजाब नेशनल बैंक
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
यूनियन बैंक
केनरा बैंक
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| वित्तीय संस्थानों के रूप में रजिस्ट्रार सूची (एफ.आई.सी.) |
| वित्तीय संस्थानों के रूप में रजिस्ट्रार सूची |
| आधार एवं बैंकिंग |
| माइक्रो भुगतान समावेश में निषेध |




आधार का प्रयोग
